Friday, April 17, 2015


बेजुबान, बेसहारा पशु-पक्षियों के जीवन पर तत्परता दिखाएगें लालावास के युवा...
‘‘अरे अपने लिए तो सब जीते है, जीना तो उनसे सिखिये जो दुसरों के लिए जीते है’’- यही मानना है लालावास की युवा पीढ़ी का। लालावास के युवाओं का कहना है कि वे बेजुबान, बेसहारा, पशु-पक्षियों की जिदंगी में आने वाली तमाम परिस्थितियों को अपनी निजी परेशानी मानते हुए उन सभी पशु-पक्षियों के लिए हर संभव प्रयास करेंगें। पशुओं के लिए एक गौशाला का इंतजाम नव वर्ष के अवसर पर किया गया था। नव वर्ष के पश्चात् से सभी बेसहारा पशुओं को गौशाला में उचित व्यव्स्था के साथ रखा गया है। 
अधमरे मिले गाय के बछड़े की हो गई थी तीन दिन पश्चात् मौत...
‘‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’’- यही कहावत सटीक बैठती है जिन्होंने उस बेसहारा मजबुर पशु के लिए भरपूर प्रयासों के बाद भी उस पशु  की जिंदगी की भीख माँग रहे थे। हर एक युवा का सपना चकनाचूर हो गया जब उनकी मेहनत विफल हो गई। उस बछड़े को बचाने के लिए युवा साथियों ने अथक प्रयास किए किंतु उनकी मेहनत काम रही। अंत में सभी को यही लगा कि काश ! हमें देर न हुई होती। प्राप्त जानकारी के मुताबिक कुछ बच्चे तथा नवयुवक क्रिकेट खेल रहे थे। दुर्भाग्यवश गेंद नजदीक ही निर्मित र्वजनिक शौचालय में चली गई। गेंद को सार्वजनिक शौचालय से लाने के लिए नवीन तथा रवि सार्वजनिक शौचालय में गए। अचानक उनकी नजर वहाँ पर अधमरे गाय के बछड़े पर पड़ी। गाय के बछड़े की हालत बहुत ही नाजुक थी। वह पशु जिंदगी और मौत के साथ निरंतर लड़ रहा था। उस बछड़े को तुरंत प्रभाव से शौचालय से बाहर निकालकार लालावास की गौशाला तक पहुँचाया गया।  वहा गौशाला में उस बछड़े को पानी तथा चारे का विशेष रूप से प्रबंध करवाया गया। उसे तुरंत चिकित्सक से अवगत कराकर प्राथमिक चिकित्सा दी गई। उस बेजुबान पशु के साथ हर संभव प्रयास करने में प्रदीप कुमार, नवीन, तथा विकास ने  सहनशीलता का परिचय देते हुए अपनी तत्परता दिखाई। अंततः दो दिन बाद वह बछड़ा जिंदगी की जंग हार गया। सूत्रों के अनुसार सार्वजनिक शौचालय में पड़े हुए उस बछड़े को दो-तीन दिन हो चुके थे। अगर समय पर पता चल जाता तो आज वो बेजुबान पशु हमारे बीच होता।
सार्वजनिक मिशन में आप भी दे सकते है अपना किमती योगदान...
लालावास की गौशाला में आप तुड़ी, रोटी, तथा पैसा इत्यादि भेंट करके अपनी श्रद्धा अनुसार किमती योगदान दे सकते है। बताया जाता है कि गौशाला में पिछले दिनों महेन्द्र शर्मा, सुरेन्द्र उर्फ लीला, जीवन राम तथा सुशील रंगा ने पशुओं की निंरतर देख रेख के प्रति अपनी चेष्टा दिखाई। 
‘‘अरे सोचों अगर मैं नहीं होता तो दुध कहाँ से पी पाते तुम’’...
उपर्युक्त शब्द है लालावास के प्राचीन ‘झोटे’ का जो पूरी तरह से अस्वस्थ है और चलने के लिए भी बेबस है। बताया जाता है कि यह दुर्दशा ढाब-ढाणी के कुछ अज्ञात युवकों ने की और उस ‘झोटे’ को इस मुकाम तक पहुँचाया है। उस पशु की दुर्दशा कभी भी शब्दों में प्रस्तुत नहीं की जा सकती। सूत्रों के मुताबिक मदनलाल वर्मा, तेजपाल तथा महेन्द्र शर्मा का उस ‘झोटे’ की दिनचर्या के प्रति सचेत होने के कारण आज भी वह ‘झोटा’ लालावास में जीवित अवस्था में है। साथियों हमें उस झोटे के प्रति मदनलाल वर्मा, तेजपाल तथा महेन्द्र शर्मा की तरह अपनी तत्परता दिखानी चाहिए ताकि उस बुजुबान पशु की आवारा हालत को सुधारा जा सकें तथा वह पशु अपनी शेष जिदंगी को व्यतीत कर सके। आप भी उस झोटे के प्रति विशेष योगदान दे सकते है।
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